एक आधुनिक समाज सच्चाई को या तो नकारता है या सच्चाई से मुंह मोड़ता है।बालश्रम कानुन केवल मात्र कागजों की शोभा बन कर रह गया है ।कानुन के सामने एक बालश्रमिक का शोषण किया जाताहै औरसमाज एक मुक दर्शक की तरह इस तमाशे का मजा लेता है।इसलिए कहा जाता है दिया तले अंधेरा ।बालश्रमिक का मालिक उसको जानवरो की तरह मारता है आंसु और सिसकियां उसके जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है ।एक शराबी पिता और असहाय मां के बीच वह एक मोहरा बन जाता है जहां उसके दुख दर्द को कोई नहीं समझ सकता है।बाल श्रम पर एक प्रभावी भाषण दिया जा सकता है मगर इसको मिटाने के लिए इस दिशा में कोई सख्त कदम नहीं उठाया जा सकता है।
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