MOHHEMD AHEMED KHAN VERSUS SHAHBANO BEGUM 1985
FACTS OF CASE—–
1.शाहबानो बेगम का निकाह मोहम्मद अहमद खान से 1932 में हुआ था ।उनके 3 बेटे और 2 बेटियां थीं ।वे इन्दौर में एक जाने माने वकील थे।
2.शादी के 14 साल बाद इनके पति ने किसी अन्य स्त्री से शादी कर ली 1975 में जब शाहबानो की उम्र 62 साल थी तब उनको बच्चों समेत घर से बाहर निकाल दिया गया।
3.अप्रैल 1978 में आपराधिक दंड संहिता की धारा 125 के अन्तर्गत उन्होंने जुडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने एक केस फाइल किया क्यों की उनके पति 200/ प्रति महिना देने से मना कर दिया था।
4.नवंबर 1978 में तीन तलाक़ का उच्चारण करके उनके पति ने तलाक दे दिया जो अंखडनीय था ।
5.भरण पोषण में न्यायलय ने मोहम्मद अहमद को 25/ प्रति माह देने का फैसला सुनाया मगर शाहबानो मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय में इस राशि को बढ़ाने के लिए रिविजन पिटीशन फाईल किया । और मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय ने इस राशि को बढ़ाकर लगभग 180/ प्रतिमाह कर दिया उसके पति ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहा ।
6.तब शाहबानो के पति ने एक एस एलपी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ फाईल की ।
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issue raised in this issue
1.crpc की धारा 125 मुस्लिम औरतों पर लागु होती या नहीं
2. मेहर की राशि देने के बाद भरण पोषण राशि देने के लिए मना कर सकता है।
2 uniform civil code सभी धर्मों और लोगों पर लागु होता है या नहीं
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decision of supreme court
1.3 फरवरी 1981 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया जिसमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय के फैसले को बरकरार रखा और मोहम्मद असलम के के सारे तर्कों को खारीज कर दिया गया ।
2.crpc की धारा 125 मुस्लिम औरतों परभी लागु होती है।
3. कोई भी मुस्लिम महिला जो अपना भरण पोषण पाने में असमर्थ हैं वह crpc की धारा 125 के अन्तर्गत भरण पोषण पाने की अधिकारी है।
Muslim women (protection of right on divorce 1986) —-तत्कालीन सरकार द्वारा एक कानून पास किया गया जिसके अनुसार एक मुस्लिम महिला इददत की अवधि तक भरण पोषण पाने की अधिकारी होगी। मगर इस कानुन ने इस फैसले में अप्रत्यक्ष रूप से बांधा डाल दी थी।इस प्रकार वह मेहर पाने की अधिकारी भी होगी ।
crtitical analysis ——इस प्रकार तीनतलाक किसी महिला के भरण पोषण के अधिकार को नहीं छीन सकता है।इस फैसले को आलोचनाओं का शिकार बनाया गया ।इस प्रकार इस केस में crpc section 125 निजी कानुनों की परिधी से बाहरहै ओर समान नागरीको संहिता सभी धर्मों और नागरीको पर समान रुप से लागु होनी चाहिए ।
conclusion—–यह फैसला न्याय पालिका के लिए एक माईल स्टोन था जिसने न्याय और समानता के सिद्धान्त को स्थापित किया ।एक मुस्लिम महिला मुस्लिम कानुन के अनुसारमेहर की मांग करसकती थी ।भरण पोषण के मामले में यह सुप्रीम कोर्ट का एक land mark decision था ।
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